आम की फसल को गुजिया एवं मिज कीट से बचाएं

आम की फसल को गुजिया एवं मिज कीट से बचाएं


 गाज़ियाबाद। जिला उद्यान अधिकारी गाजियाबाद ने जानकारी देते हुए बताया है कि प्रदेश में आम की अच्छी उत्पादकता सुनिश्चित करने के दृष्टिकोण से यह आवश्यक है कि आम की फसल को सम - सामयिक हानिकारक कीटों में पचाने हेतु उचित समय पर प्रबंधन किया जाय। माह दिसम्बर / जनवरी अत्यन्त महत्पूर्ण है इस माह में गुजिया एवं मिज कीट का प्रकोप की संभावना रहती है, जिससे आम की फसल को काफी क्षति पहुंचती है। अतएव उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग उत्तर प्रदेश लखनऊ द्वारा बागवानो / कृषक भाइयों को इन कीटों को प्रकोप से बचाव हेतु  सलाह दी जाती है कि गुजिया किट (मैंगो मिलीबग) इस कीट के बच्चे (निंफ), तथा मादा वयस्क जमीन से निकल कर पेड़ों पर चलते हैं और मुलायम पत्तियां बंजरिया एवं फलों से रस चूसकर क्षति पहुंचाते हैं। इसके शिशु कीट 1 - 2 मिमी0 हल्के एवं लंबे गुलाबी रंग के चपटे तथा मादा वयस्क कीट सफेद रंग के पंखहीन एवं चपटे होते हैं।



इनके द्वारा रस चूस जाने से पेड़ों के प्ररोह , पत्तियां तथा बोर सूख जाते है तथा फल नही लगते है। इसके साथ ही कीट द्वारा मधु स्रव करता है , जिससे पत्तियो / टहनियों पर फफूंदी (सूटी मोल्ड़) लग जाती है, फलस्वरूप आम की फसल को कभी पहुँचती है इस कीट नियंत्रण हेतु बागों की गहरी जुताई / गुड़ाई की जाय तथा कीट (निम्फ) को पेडों  पर चढ़ने से रोकने के लिए माह दिसम्बर में आम के पेड़ के मुख्य तने पर भूमि से 30 - 50 सेंटीमीटर की ऊंचाई पर पर 400 गेज की पालीथीन शीट की 25 सेमी0 चौड़ी पटटी को तने से चारों ओर लपेट कर ऊपर व नीचे सुतली से  बांधकर पॉलीथान शीट के ऊपरी व निचले हिस्से पर ग्रीस लगा देना चाहिए। जिससे कीट पेड़ों के ऊपर ना चल सके।


इसके अतिरिक्त शिशुओं को जमीन पर मारने के लिए दिसम्बर के अंतिम या जनवरी के प्रथम सप्ताह से 15 - 15 दिन के अन्तर पर दो बार क्लोरीपाइरीफॉस (1.5 प्रतिशत) चूर्ण 250 ग्राम प्रति पेड़ के हिसाब से तने के चारों ओर बुरकाव करना चाहिए। अधिक प्रकोप की दशा में यदि किट पर चढ़ जाते है तो ऐसी स्थिति में 00.5 % कारबोसल्फ़ान अथवा 0 .06% डायमेटोएट 2.0 मि0ली0 दवा को प्रति ली० पानी में घोल बनाकर आवश्यकतानुसार छिड़काव करें। इसी प्रकार आम के बोर में लाने वाले मिज कीट मंजरियों, तुरन्त बने फूलों एवं फलों तथा बाद में मुलायम कोपलों में अण्डे देती है, जिसकी सूडी अन्दर ही अन्दर खाकर क्षति पहुँचाती है। इस कीट से प्रभावित पुष्प गुच्छ व डंठल टेढ़े पड़ जाते है तथा वहां काले काले धब्बे दिखाई देते हैं, फलस्वरूप छोटे - छोटे फल गिरने लगते हैं तथा बौर सुख जाते है। इस कीट के नियंत्रण के लिए यह आवश्यक है कि बागों की जुताई / गुलाई की जाय, इसके लिए फोनिट्रोथियान 50 ई०सी० 1.0 मिमी अथवा डायमेथोएट 30 ई0सी0 2.0 मि0ली0 दवा प्रति लीटर पानी में घोलकर बौर निकलने की अवस्था पर एक छिड़काव एवं आवश्यकतानुसार 15 दिन बाद दूसरा छिड़काव करने की सलाह दी जाती है।


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