मोदीनगर का मोदी मंदिर जहां बनते हैं सात जन्मों के रिश्ते 
मोदीनगर का मोदी मंदिर जहां बनते हैं सात जन्मों के रिश्ते 

 

संस्थापकों ने  मंदिर का धर्म लाभ दर्शन भजन के लिए  निर्माण कराया था लेकिन उससे भी ज्यादा आज समाज काम के आ रहा है। यहां एक दूसरे के जीवन साथी बनने वाले जोड़ें मिलते हैं और मे ही मंदिर में सात जन्मों के रिश्ते तय हो जाते हैं।

 

 

मोदीनगर। सन 1955 में अवधूत कृष्णा नंदी महाराज ने  मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा की थी। उसी प्राण प्रतिष्ठा को साकार किया सेठ स्वर्गीय राय बहादुर गुजरमल मोदी ने। अपनी धार्मिक प्रवृत्ति के कारण ही उन्होंने सन् 1955 में श्री लक्ष्मी नारायण के नाम से अद्भुत मंदिर का निर्माण कराया। यह मंदिर मोदीनगर में स्थित है जो आज मोदी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। वैसे तो यह मंदिर श्री लक्ष्मी नारायण जी का है लेकिन इसमें और भी कई देवी-देवताओं के  प्रतिमा की स्थापना भी की गई है। जिनमें शिव पार्वती मंदिर, दुर्गा देवी मंदिर, हनुमान मंदिर, राम लक्ष्मण सीता मंदिर, बालाजी मंदिर और संतोषी मां का मंदिर है। कुल मिलाकर 7 और मंदिरों की स्थापना की गई है। पूजा के अलावा इस मंदिर में सामाजिक और धार्मिक कार्य भी कराए जाते हैं। मंदिर में धार्मिक कार्यों भजन, कीर्तन, भागवत के अलावा सामाजिक कार्य तेरहवीं और रिश्ते तय होने के साथ-साथ शादी ब्याह भी संपन्न कराए जाते हैं।


 

मंदिर के एक सिरे पर चित्रकला प्रदर्शनी का कमरा बना हुआ है। जिसमें स्वर्गीय राय बहादुर गूजरमल मोदी और स्थापित की गई फैक्ट्रियों की चित्रकला की प्रदर्शनी भी होती है। उन प्रदर्शनियों में किन फैक्ट्रियों की स्थापना कब की गई यह दर्शाया गया है। वहीं स्वर्गीय राय बहादुर गूजरमल मोदी को जगह-जगह सम्मानित होते हुए चित्र कला के माध्यम से दिखाया गया है। जोकि मोदीनगर के वैभवशाली समय वह नगर के संस्थापकों केस अधिकारियों से लोगों को परिचित कराते हैं। प्रारंभ में मंदिर में सिर्फ लोग भगवत दर्शन वह भजन के लिए जाते थे। उसके बाद नगर के बुजुर्गों के साथ ही युवा वर्ग भी यहां आकर यहां के पवित्र वातावरण के बीच घंटों यही रहते। उसके बाद मोदी मंदिर रिश्ते तय करने का स्थान भी बन गया। यहां वधू पक्ष व वर पक्ष दोनों ही आकर मिलते हैं और जिनके रिश्ते होने हैं वह भी एक दूसरे की झलक देख लेते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से भी ऐसे आयोजनों के लिए मोदी मंदिर काफी मुफीद है। होटल, बैंकट हॉल आदि में ऐसे कार्यक्रमों के लिए मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। लेकिन वही कार्य यहां बिना किसी बड़े खर्चे के हो जाते हैं। कुल मिलाकर मंदिर के संस्थापकों ने जिस उद्देश्य भजन, पूजन के लिए इसका निर्माण कराया था। आज यह उन उद्देश्यों से भी अधिक महत्वपूर्ण कार्यों का साक्षी बन रहा है।

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