मौलवियों के लिबास में गीदड़ों से सावधान- फरमान अब्बासी

मौलवियों के लिबास में गीदड़ों से सावधान- फरमान अब्बासी



ज़मीर जिसका बचा होता है, इंसानियत भी उसी के अंदर नज़र आती है। ज़मीर कब किसका गिर जाए कुछ कहा नही जा सकता, और ज़मीर गिरने के बाद इंसान किस हद तक गिर सकता है। अंदाज़ा नही लगाया जा सकता। सर पर टोपी और चेहरे पर दाढ़ी, सफेद लिबास होने से जरूरी नहीं कि वो तालिब ए इल्म या सच्चा इंसान होता है। नबी के लिबास और दाढ़ी के साथ साथ नबी के अखलाक, आदतें भी होना जरूरी होता है। इसलिए ऐसे दिखने वालों पर तुरन्त यकीन करना उचित नहीं। उनके दिल और मन को भी समझना जरूरी है। आज इस दौर में हमारे बहुत भाईयों की उम्मीदे टूटी है।


मुज़फ्फरनगर के अलावा विभिन्न जगह ऐसे कथित मौलवी देखे जा सकते हैं जो आपकी परवाह नहीं बल्कि अपनी जान की परवाह ज्यादा करते हैं। लोग उन्हें उलेमा समझ बैठते हैं, जिनका काम सिर्फ प्रशासनिक अधिकारियों की नज़रों में अपनी छवि बेहतर बनाना होता है। जो कलफ का कुर्ता पहनकर डीएम एसपी के अलावा अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काटते हों और उनकी जी हुजूरी में लगे रहते हों। उन्हें उलेमा कहना, उलेमा ए दीन की तौहीन कही जाएगी। उनकी खुशामदे, मिन्नतें, उनके साथ फोटो खिंचवाने की होड़ उनमें उलेमा का कुछ गुण दर्शाती नहीं दिखती।


उलेमा ये फर्जी कौम के रहनुमा नहीं बल्कि वो अल्लाह के नेक बन्दे होते हैं। जिनसे मिलने के लिए डीएम एसपी तो क्या, बड़े बड़े मंत्री, नेता मिलने के लिए तरसते हैं। उनके लिए हाई कमान और सिफारिश का रास्ता सिर्फ एक होता है। वो मिन्नते, गुज़ारिशे सिर्फ एक करते है। उनके दिल में खौफ सिर्फ एक का होता है। उन्हें दुनिया में अगर किसी से डर लगता है तो सिर्फ गुनाह से, रुसवाई से, अल्लाह की नाराजगी से। आप उन लोगों से उम्मीद मत रखो, सिर्फ रब्बुल अलामीन से उम्मीद करने की आदत डालो। चेहरे या लिबास से अच्छा इंसान होने का पता नही चलता। उसके मन और दिल को जानकर ही उसकी अच्छाई का पता लगाया जा सकता है। सरवट के एक मदरसे के मौलवी की सच को सच कहते हुए भी सच्ची जुबान लड़खड़ाती नज़र आती है। 
तुमसे अच्छा तो आम इंसान है, जिसकी बातों में तड़प दिख रही थी। 
आज मैं न भाजपा की बात करूंगा, न कांग्रेस की और न ही किसी दल की। सिर्फ बात होगी रहबरों के लिबास में गीदड़ों की। बजट सत्र के दौरान उत्तर प्रदेश विधान परिषद में मौलाना महमूद मदनी के प्रयासों से सपा में एमएलसी बने आशु मलिक की स्पीच तो सुनकर भी अफसोस हुआ। मौलाना साहब इन्हें एमएलसी की कुर्सी तक किसलिए भिजवाया आपने, ताकि ये उत्तर प्रदेश के मज़लूम मुस्लिमों की आवाज़ भी न उठा सकें। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ संवैधानिक पद पर बैठकर भी सीधे मुस्लिमों की नस्लों को सबक सिखाने की बात कहते है और आप विधान सभा या विधान परिषद में उनकी बातों पर अफसोस तक जताते नहीं दिखते। कोई सफाई की बात करता है तो कोई पुराली और किसानों की, मगर ज़ुल्म ज्यादती पर खामोश रहते है।


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