मजदूर परवासियों का नहीं रुक रहा पलायन

मजदूर परवासियों का नहीं रुक रहा पलायन



मुरादनगर। देश में कोरोना को लेकर तालाबंदी के बाद प्रवासी मजदूरों के पलायन की ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं जिन्हें देखकर दुख भी होता है। कुछ मासूम उम्र से पहले ही इस लॉक डाउन ने बड़े कर दिए। आयु 14 से 16 वर्ष, भूखा पेट, लग्न जल्दी घर पहुंच जाने की। कम उम्र का समझ कर पुलिस न रोक ले इसके लिए वैकल्पिक रास्तों की तलाश कर मंजिल की ओर बढ़ते मासूमों को देखकर किसी का भी कलेजा मुंह को आ सकता है।


विक्की, उमेश, राकेश, राजकुमार, मनोज, उस्मान, राशिद, सलीम व परवेज उत्तर प्रदेश के सीतापुर के रहने वाले हैं। गांव के ही पास का रहने वाला एक व्यक्ति पंजाब के लुधियाना में ऊनी वस्त्रों की फैक्ट्रियों में बच्चों से काम कराने के लिए ले आता था। बच्चे काम अधिक पैसा कम फैक्ट्री वालों के लिए भी मजदूर बहुत कम लागत में उपलब्ध थे।


लॉक डाउन के शुरुआती दिनों में फैक्ट्री मालिक ने उन्हें कुछ खाने को दिया लेकिन कुछ ही दिनों बाद उसने खाना देने से भी मना कर दिया। ठेकेदार उनको छोड़कर पहले ही लापता हो चुका था। काम नहीं तो रोटी भी नहीं कब तक भूखे भटकते। पैदल ही 8 नाबालिग लुधियाना से गांव के लिए चल दिए। मुरादनगर पहुंचे इन किशोरों ने अपनी कहानी बताई जिसे सुनकर लोग भी उनके हौसले के कायल हो गए। उनका कहना था कि मालिक ने बिना काम भोजन नहीं दिया। कहीं काम नहीं मिला एक ही रास्ता दिखलाई दिया कि किसी तरह घर पहुंच जाएं। प्रवासियों को घर पहुंचाने के समाचार प्रतिदिन दिखलाई दे रहे हैं। 8 मासूम लंबा सफर कर यहां आ पहुंचे लेकिन रास्ते में उन्हें किसी तरह की सरकारी सहायता नहीं मिली और उनका कहना है कि यदि वह पुलिस ने पकड़ लिए तो उन्हें घर नहीं पहुंचने दिया जाएगा। इसलिए मंजिल तय करने के साथ ही नए रास्ते भी उन्हें तलाश करने पड़ रहे हैं।


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