गाय समाज में सर्वप्रथम है - विनोद जिंदल

गाय समाज में सर्वप्रथम है - विनोद जिंदल



मुरादनगर। केंद्र सरकार द्वारा गौ हत्या पर पाबन्दी लगाने एवं कठोर सजा देने के निर्देश पर मानों सेक्युलर जमात की नींद ही उड़ गई है। एक से बढ़कर एक कुतर्क गौ हत्या के समर्थन में कुतर्की दे रहे है। यह बातें व्यवसाई समाजसेवी विनोद जिंदल ने कहते हुए बताया कि केरल में कुछ कांग्रेस नेताओं ने सरेआम गौ वध कर अपने आपको सेक्युलर सिद्ध करने का प्रयास किया। हमारे देश में एक जमात है इसके अनेक मुखौटे है। कभी यह अपने आपको बुद्धिजीवी, कभी मानवाधिकार कार्यकर्ता, कभी एक्टिविस्ट, कभी समाज सेवी, कभी पुरस्कार वापसी गैंग आदि के रूप में सामने आता हैं। गौहत्या के पक्ष में एक से बढ़कर एक कुतर्क दिए जा रहे है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को हर विषय में तर्क वितर्क कर सही और गलत का फैसला लेना चाहिए उन्होंने बताया कि कुछ लोग गौ हत्या पर कुतर्क कर रहे हैं जैसे कि गो हत्या पर पाबन्दी से देश में लाखों व्यक्ति बेरोजगार हो जायेंगे जो मांस व्यापर से जुड़े है।


उसका सटीक जवाब है की गौ पालन भी अच्छा व्यवसाय है। इससे न केवल गौ का रक्षण होगा अपितु पीने के लिए जनता को लाभकारी दूध भी मिलेगा। वह व्यक्ति गौ पालन को अपना व्यवसाय बना सकते हैं। इससे न केवल धार्मिक सौहार्द बढ़ेगा अपितु सभी का कल्याण होगा। जिंदल ने कहा कि... 


 


कुतर्क नं 2. गौ मांस गरीबों का प्रोटीन है। प्रतिबन्ध से उनके स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव होगा।


समीक्षा- एक किलो गौ मांस 150 से 200 रुपये में मिलता हैं जबकि इतने रुपये में 2 किलो दाल मिलती हैं। एक किलो गौमांस से केवल 4 व्यक्ति एक समय का भोजन कर सकते हैं जबकि 2 किलो दाल में कम से कम 16-20 आदमी एक साथ भोजन कर सकते हैं। मांस से मिलने वाले प्रोटीन से पेट के कैंसर से लेकर अनेक बीमारियां होने का खतरा हैं जबकि शाकाहारी भोजन प्राकृतिक होने के कारण स्वास्थ्य के अनुकूल हैं। ऐसा वैज्ञानिक प्रयोगों से सिद्ध हुआ है। जिंदल ने आगे बताया... 


 


कुतर्क नं 3. गौ मांस पर प्रतिबन्ध अल्पसंख्यकों पर अत्याचार है क्यूंकि यह उनके भोजन का प्रमुख भाग है।


समीक्षा- मनुष्य स्वाभाव से मांसाहारी नहीं अपितु शाकाहारी है। वह मांस से अधिक गौ का दूध ग्रहण करता है। इसलिए यह कहना की गौ का मांस भोजन का प्रमुख भाग है एक कुतर्क ,मात्र है। एक गौ अपने जीवन में दूध द्वारा हज़ारों मनुष्यों की सेवा करती है, जबकि मनुष्य इतना बड़ा कृतघ्नी है कि उसे सम्मान देने के स्थान पर कसाइयों से कटवा डालता है।


 


कुतर्क नं 4. अगर गौ मांस पर प्रतिबन्ध लगाया गया तो बूढ़ी एवं दूध न देनी वाली गौ जमीन पर उगने वाली सारी घास को खा जाएगी जिससे लोगों को घास भी नसीब न होगी।


समीक्षा- गौ घास खाने के साथ साथ गोबर के रूप में प्राकृतिक खाद भी देती है। जिससे जमीन की न केवल उर्वरा शक्ति बढ़ती है। अपितु प्राकृतिक होने के कारण उसका कोई दुष्परिणाम नहीं है। प्राकृतिक गोबर की खाद डालने से न केवल धन बचता है। अपितु उससे जमीन की उर्वरा शक्ति भी बढ़ती है। साथ में ऐसी फसलों में कीड़ा भी कम लगता है, जिनमें प्राकृतिक खाद का प्रयोग होता है। इस कारण से महंगे कीटनाशकों की भी बचत होती है। साथ में विदेश से महंगी रासनायिक खाद का आयात भी नहीं करना पड़ता। बूढ़ी एवं दूध न देनी वाली गौ को प्राकृतिक खाद के स्रोत्र के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। 


 


कुतर्क नं 5. गौहत्या पर प्रतिबन्ध अल्पसंख्यकों के अधिकारों का अतिक्रमण है। 


समीक्षा- बहुसंख्यक के अधिकारों का भी कभी ख्याल रखा जाना चाहिए। इस देश में बहुसंख्यक भी रहते है। गौहत्या रोक से अगर बहुसंख्यक समाज प्रसन्न होता है तो उसमें बुराई क्या है।


 


कुतर्क नं 6. गौहत्या करने वाले को 10 वर्ष की सजा का प्रावधान है जबकि बलात्कारी को 7 वर्ष का दंड है। क्या गौ एक नारी के शील से अधिक महत्वपूर्ण हो गई?


समाधान- हम तो बलात्कारी को उम्रकैद से लेकर फांसी की सजा देने की बात करते है। आप लोग ही कटोरा लेकर उनके लिए मानव अधिकार के नाम पर माँफी देने की बात करते है। सबसे अधिक मानव अधिकार के नाम पर रोना एवं फांसी पर प्रतिबन्ध की मांग आप सेक्युलर लोगों का सबसे बड़ा ड्रामा है।


 


कुतर्क नं 7. गौहत्या के व्यापर में हिन्दू भी शामिल है।


समाधान- गौहत्या करने वाला हत्यारा है। वह हिन्दू या मुसलमान नहीं है। पैसो के लालच में अपनी माँ को जो मार डाले वह हत्यारा या कातिल कहलाता है नाकि हिन्दू या मुस्लमान। सबसे अधिक गोमांस का निर्यात मुस्लिम देशों को होता है। इससे हमारे देश के बच्चे तो दूध के लिए तरस जाते है और हमारे यहाँ का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है। इन कसाईयों की योजना हरे भरे भारत देश को रेगिस्तानी देश बनाना है। 


 


कुतर्क नं 8. अगर गौ से इतना ही प्रेम है तो उसे सड़कों पर क्यों छोड़ देते है।


समाधान- प्राचीन काल में राजा लोग गौ को संरक्षण देने के लिए गौशाला आदि का प्रबंध करते थे जबकि आज की सरकारे सहयोग के स्थान पर गौ मांस के निर्यात पर सब्सिडी देती है। विडंबना देखिये मुर्दों के लिए बड़े बड़े कब्रिस्तान बनाने एवं उनकी चारदीवारी करने के लिए सरकार अनुदान देती है, जबकि जीवित गौ के लिए गौचर भूमि एवं चारा तक उपलब्ध नहीं करवाती। अगर हर शहर के समीप गौचर की भूमि एवं चारा उपलब्ध करवाया जाये तो कोई भी गौ सड़कों पर न घूमे। खेद हैं हमारे देश में अल्पसंख्यकों को लुभाने के चक्कर में मुर्दों की गौ माता से ज्यादा औकाद बना दी गई है। गावों आदि में पशुओं के चरने के लिए जो गोचर भूमि होती थी। या तो उस पर अवैध कब्ज़ा हो गया अथवा खेती की जाने लगी। उस भूमि को दबंगों से खाली करवाकर गौ के चरने के लिए प्रयोग किया जाता तो गौ सड़कों पर नहीं घूमती। 


 


कुतर्क नं 9. गौ पालन से ग्रीन हाउस गैस निकलती है जिससे पर्यावरण की हानि होती हैं।


समाधान- यह वैज्ञानिक तथ्य है कि मांस भक्षण के लिए लाखों लीटर पानी बर्बाद होता है। जिससे पर्यावरण की हानि होती है। साथ में पशुओं को मांस के लिए मोटा करने के चक्कर में बड़ी मात्र में तिलहन खिलाया जाता है। जिससे खाद्य पदार्थों को अनुचित दोहन होता है। शाकाहार पर्यावरण के अनुकूल है और मांसाहार पर्यावरण के प्रतिकूल है। कभी पर्यावरण वैज्ञानिकों का कथन भी पढ़ लिया करो?


 


कुतर्क नं 10. गौमांस पर प्रतिबन्ध भोजन की स्वतंत्रता पर आघात है। हम क्या खाये क्या न खाये आप कौन होते है यह सुनिश्चित करने वाले?


समाधान- मनुष्य कर्म करने के लिए स्वतंत्रता है मगर सामाजिक नियम का पालन करने के लिए परतंत्र है। एक उदहारण लीजिये आप सड़क पर जब कार चलाते है। तब आप यातायात के सभी नियमों का पालन करते है अन्यथा दुर्घटना हो जाएगी। आप कभी कार को उलटी दिशा में नहीं चलाते और न ही कहीं पर भी रोक देते है अन्यथा यातायात रुक जायेगा। यह नियम पालन मनुष्य की स्वतंत्रता पर आघात नहीं है अपितु समाज के कल्याण का मार्ग है। इसी नियम से भोजन की स्वतंत्रता का अर्थ दूसरे व्यक्ति की मान्यताओं को समुचित सम्मान देते हुए भोजन ग्रहण करना है। जिस कार्य से समाज में दूरियां, मनमुटाव, तनाव आदि पैदा हो उस कार्य को समाज हित में न करना चाहिये। जो आप सोचे वह सदा ठीक हो ऐसा कभी नहीं होता। 


 


कुतर्क नं 11- प्राचीन काल में गौ की यज्ञों में बलि दी जाती थी और वेदों में भी इसका वर्णन मिलता है। 


समाधान- इस भ्रान्ति के होने के मुख्य-मुख्य कुछ कारण है। सर्वप्रथम तो पाश्चात्य विद्वानों जैसे मैक्समुलर, ग्रिफ्फिथ आदि द्वारा यज्ञों में पशुबलि, माँसाहार आदि का विधान मानना, द्वितीय मध्य काल के आचार्यों जैसे सायण, महीधर आदि का यज्ञों में पशुबलि का समर्थन करना, तीसरा ईसाईयों, मुसलमानों आदि द्वारा माँस भक्षण के समर्थन में वेदों कि साक्षी देना, चौथा साम्यवादी अथवा नास्तिक विचारधारा के समर्थकों द्वारा सुनी-सुनाई बातों को बिना जाँचें बार बार रटना।


वेदों में मांस भक्षण का स्पष्ट निषेध किया गया हैं। अनेक वेद मन्त्रों में स्पष्ट रूप से किसी भी प्राणि को मारकर खाने का स्पष्ट निषेध किया गया हैं। जैसे 


 


हे मनुष्यों ! जो गौ आदि पशु हैं वे कभी भी हिंसा करने योग्य नहीं हैं - यजुर्वेद 1/1 


 


जो लोग परमात्मा के सहचरी प्राणी मात्र को अपनी आत्मा का तुल्य जानते हैं अर्थात जैसे अपना हित चाहते हैं वैसे ही अन्यों में भी व्रतते हैं-यजुर्वेद 40/7  


हे दांतों तुम चावल खाओ, जौ खाओ, उड़द खाओ और तिल खाओ। तुम्हारे लिए यही रमणीय भोज्य पदार्थों का भाग हैं । तुम किसी भी नर और मादा की कभी हिंसा मत करो।- अथर्ववेद 6/140/2 


 


वह लोग जो नर और मादा, भ्रूण और अंड़ों के नाश से उपलब्ध हुए मांस को कच्चा या पकाकर खातें हैं, हमें उनका विरोध करना चाहिए- अथर्ववेद 8/6/23 


 


निर्दोषों को मारना निश्चित ही महापाप है, हमारे गाय, घोड़े और पुरुषों को मत मार। -अथर्ववेद 10/1/29 


इन मन्त्रों में स्पष्ट रूप से यह सन्देश दिया गया है कि वेदों के अनुसार मांस भक्षण निषेध है। 


इन कुतर्कों का मुख्य उद्देश्य युवा मस्तिष्कों को भ्रमित करना है। इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करके अपने मित्रों को बचायें। जिंदल ने कहा कि यह लक्षण सामान होते हैं। इसके अलावा भी बहुत सी ऐसी समस्याएं होती है जिन्हें सबके साथ साझा करनी चाहिए। 


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