देश के लिए समर्पित महापुरुषों के कार्यों से युवा पीढ़ी को अवगत कराया जाए - विनोद जिंदल

देश के लिए समर्पित महापुरुषों के कार्यों से युवा पीढ़ी को अवगत कराया जाए - विनोद जिंदल



मुरादनगर। जिस राजनीति को आज लोग शक भरी निगाहों से देख रहे हैं उस राजनीति में ऐसे लोग भी हुए हैं जो अन्य राजनीतिज्ञों के लिए भी प्रेरणा हैं। यह बातें समाजसेवी लीलावती रामगोपाल सरस्वती विद्या मंदिर के प्रबंधक विनोद जिंदल ने कहते हुए बताया कि गुरुकुल घरोंदा के आचार्य स्वामी सन्यासी रामेश्वरानंद राजनीति में एक हीरे के समान थे। जनसंघ के टिकट पर सांसद बने। उन्होंने सरकारी आवास नहीं लिया। वे दिल्ली के बाजार दिल्ली 6 के आर्य समाज मंदिर में ही रहते थे। वँहा से संसद तक पैदल कार्रवाई में भाग लेने के लिए जाते थे। 


जिंदल ने बताया कि वे ऐसे पहले सांसद थे जो हर सवाल पूछने से पहले संसद में एक वेद मंत्र बोला करते थे। वे सब वेदमंत्र संसद की कार्रवाई के रिकार्ड में देखे जा सकते हैं। उन्होंने एक बार संसद का घेराव भी किया था। गोहत्या पर बंदी के लिए उनकी महानता इसी बात से पता चल जाती है कि एक बार पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किसी मीटिंग में उन स्वामी जी को पांच सितारा होटल में बुलाया। वहां जब भोजन का समय हुआ सभी सांसद होटल में उपलब्ध भोजन कर रहे थे। स्वामी ही वहां नही गए। उन्होंने अपनी जेब से लपेटी हुई बाजरे की सूखी दो रोटी निकाली और बुफे काउंटर से दूर जमीन पर बैठकर खाने लगे। 


प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनके पास पहुंचकर कहा आप क्या क्या कर रहे हैं। सभी पांच सितारा व्यवस्थाएं आप सांसदों के लिए ही तो की गई है। जिस पर उन्होंने जवाब दिया कि मैं सन्यासी हूं। सुबह भिक्षा में किसी ने यही रोटियां दी थी। मैं सरकारी धन से रोटी भला कैसे खा सकता हूं। होटल में उन्होंने इंदिरा गांधी से एक गिलास पानी और आम के अचार की एक फांक ली थी ।जिसका भुगतान भी अपनी जेब से किया था। वह परम गौ भक्त, अद्वितीय व्यक्तित्व के स्वामी हरियाणा के करनाल से सांसद थे। 


ऐसे अनेकों महान व्यक्तित्व इस देव भूमि भारत हुए हैं लेकिन उनके बारे में कोई पाठ्यक्रम तक नहीं चलाया गया जिससे हमारी युवा पीढ़ी ऐसे महान नेताओं के बारे में नहीं जान पाई। आवश्यकता है ऐसे देश के लिए समर्पित चंद नेताओं के बारे में भी पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जाए। जिससे बच्चे व युवा पीढ़ी उनसे बहुत से प्रेरणा ले सकते हैं। भारत को तपस्वियों का देश ऐसे ही नहीं कहा जाता। जिंदल ने कहा कि ऐसे महान व्यक्तियों का कहीं भी और कभी भी जिक्र नहीं किया जाता। जबकि यह आवश्यक है जिससे ऐसे राजनीतिज्ञों के बारे में भी सबको ज्ञान हो सके। उन्होंने अभिभावकों का भी आवाहन किया है कि वह ऐसे महान लोगों के कार्यों आचरण के बारे में बताएं। इससे उनका ज्ञान बढ़ेगा ही और आम जनमानस का राजनीतिज्ञों के प्रति शक वाला नजरिया बदल सकता है। 


 


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