देश में नफरत और हिंसा के बीज बो रहा है डिजिटल मीडीया - मुहम्मद इरफान

देश में नफरत और हिंसा के बीज बो रहा है डिजिटल मीडीया - मुहम्मद इरफान



हिन्दुस्तान के प्रत्येक नागरिक की ज़िम्मेदारी है कि वह अपने देश के संविधान की हिफाज़त करे। इस कि हिफ़ाज़त देश के नियमों का पालन करके की जा सकती है। गंगा जमुनी तहजीब, जो समाज के सभी समुदायों के बीच सौहार्द पैदा करती है, उसकी हिफाज़त करें। सब मिलजुलकर रहेँगे तभी हमारा मुल्क तरक्क़ी की राह पर अग्रसर रहेगा। समाज के सभी वर्गों का सम्मान किया जाना चाहिए, सभी धर्मों को बराबर समझना चाहिए। किसी धर्म के प्रति पक्षपात की भावना समाज के सौहार्द को कलन्कित करती है। लेकिन इस मुल्क में कुछ ग़ैर ज़िम्मेदार नागरिक, असामाजिक तत्व, समाज की गंगा जमुनी तहजीब को दूषित करने के लिए नफ़रत के बीज बोते हैं। जिससे समाज व देश के विभिन्न समुदायों को आसानी से लड़ाकर देश की फ़िज़ा को खराब करते हैं। और अपने ही देश के नागरिकों को एक दूसरे के खून का प्यासा करदेते हैं। एक ही देश के नागरिक एक दूसरे की जान लेने पर आमादा हो जाते हैं। वह अपने देश की साँस्कृतिक विरासत को भी भूल जाते हैं। देश के आज़ाद होने के बाद सन 1960 से ही एक ग़ैर राजनीतिक पार्टी ने समाज में एक धर्म विशेष के ख़िलाफ़ नफ़रत के बीज बोने शुरू कर दिये थे। आज देश में विभिन्न समुदायों के बीच नफ़रत फैलाकर उसकी फ़सल काट रहे हैं, जबकि वह दल अपने आप को देशभक्तों का दल कहलाता है। उसी पार्टी के सदस्य आज टी वी चैनलों में एंकर बनकर समाचार पत्रों के माध्यम से, सोशल मीडिया के ज़रिए नफ़रत फैला रहे हैं, और इसमें सबसे बड़ा रोल अदा किया है टी वी चैनलों ने।


टी आर पी या आर्थिक हितों के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विवादास्पद कार्यक्रमों से भी परहेज़ नहीं करते। ऐसे कार्यक्रमो पर दो ही तरह से नियंत्रण लगाया जा सकता है, या तो दर्शकों इनके आर्थिक हितों को चोट पहुंचाये, या फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चैनल्स खुद आत्मनियत्रंण का परिचय दें।


सुदर्शन टी वी के विवादास्पद कार्यक्रम के दो एपिसोडों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा कर और इस मामले की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील मामले पर ज़रूरी सकिरयता का परिचय दिया है। दरअसल ये न्यूज़ चैनल" यू पी एस सी जेहाद" नाम से एक कार्यक्रम का प्रसारण कर रहा था, जो नौकरशाही में मुस्लिम समुदाय की कथित घुसपैठ पर आधारित था। ग़ौरतलब बात है कि केंद्र सरकार ने इस कार्यक्रम के प्रसारण को हरी झंडी इस शर्त पर दी थी कि प्रोग्राम कोड का उलंघन नहीं किया जाएगा अर्थात कार्यक्रम में किसी समूह या समुदाय को निशाना नही बनाया जाएगा। इसके बावजूद इस कार्यक्रम में, जिसे खोजपरक रिपोर्ट बताया गया, एक समुदाय विशेष को बदनाम करने की कोशिश की जारही थी। इतना ही नहीं इस कार्यक्रम में तथ्यों के बग़ैर संघ लोक सेवा आयोग की परिक्षाओ को भी संदेह के दायरे में लाया जा रहा था,जो हैरान करने वाला है। आज तो कंडीशन ये है कि महामारी के कारण ऐसे धारावाहिक और कार्यक्रम सीधे ओ टी टी पिलेटफार्म पर जारी किए जा रहे हैं जिनमें गाली गलौज की भरमार है। दूसरी ओर ये चैनल बेहद संवेदनशील साम्प्रदायिक मुददे पर अंगभीरता का परिचय दे रहा था। जबकि ऐसे मामलों में अतिवादी प्रकिया से बचे जाने की ज़रूरत है। ज़ाहिर है, अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर ऐसे ग़ैरज़िम्मेदार क़दमों का बचाव नहीं किया जा सकता। अदालत ने ठीक ही टिप्पणी की, कि चैनल को अपनी आज़ादी का सावधानी पूर्वक उपयोग करना चाहिए। ऐसी स्थिति में सिर्फ बाहरी या मौके का फायदा उठा ने वाले तत्वों पर कार्यवाही से ही काम नहीं चलेगा बल्कि पूरी परिस्थिति को ही बदलना होगा। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आमतौर पर टी आर पी या आर्थिक हितों के लिए इस तरह के कार्यक्रम प्रसारित करता है। ऐसे विवादास्पद कार्यक्रमो पर अंकुश लगाया जा सकता है, या तो दर्शक इनके आर्थिक हितों को चोट पहुचायें, या फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चैनल्स खुद आत्मनियंत्रण का परिचय दें। ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आत्मनियत्ररण के लिये एक कमेटी के गठन का सुप्रीम कोर्ट का सुझाव सही और समयोचित है।


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यूज़ चैनलों में टी आर पी पाने के लिए सनसनीखेज ख़बर दिखाने की होड़ राष्ट्र को अस्थिर करने का कारण बन सकती है। इस टी वी चैनल के विवादित कार्यक्रम की रोक याचिका की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा, जब हम पत्रकारिता आज़ादी की बात करते हैं तो यह बेलगाम नही हो सकती। मीडिया को भी उतनी ही स्वतंत्रता है, जितनी देश के अन्य नागरिकों को है। अदालत ने आगे कहा एक आज़ाद समाज में किसी समुदाय या धर्म को निशाना बनाना सहन नहीं किया जा सकता, मीडिया को अपनी लक्ष्मण रेखा खुद ही तय करनी चाहिए।


जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने अपने आदेश में कहा,कि पहली नज़र में कार्यक्रम मुस्लिम समुदाय को अपमानित करने का दिखाई देता है। आप एक समुदाय को बदनाम करने का दुर्भावना पूर्ण प्रयास है। मुस्लिम समुदाय द्वारा सिविल सेवा परीक्षा पास करने पर आधारित इस विवादित कार्यक्रम की शेष दोंनो कड़ियों के प्रसारण पर अग्रिम आदेश तक रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा, कि डिजिटल मीडिया ज़हरीली नफ़रत और हिंसा फैला रहा है। ये पूर्ण रूप से अनियंत्रित है, और लोगों की प्रतिष्ठा को धूमिल कर रहा है। डिजिटल मीडिया विनियमन (रेगुलेशन) भी एक ऐसा विषय है, जिस पर विधायिका को परीक्षण करना चाहिए। जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस के एम जोसेफ़ की पीठ के समक्ष सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की तरफ से दाख़िल हलफनामे में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट को प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए नये दिशा निर्देश बनाने की ज़िम्मेदारी विधायिका या सक्षम अथॉरिटी पर छोड़ देना चाहिए या उससे पहले डिजिटल मीडिया को नियंत्रित करने की कवायद करनी चाहिए ताकि टी वी चैनल्स के द्वारा देश में फैलाई जा रही नफ़रत को नियंत्रित कर के देश को उन्नति की राह पर ले जाया जा सके।


काश मेरे मुल्क में ऐसी एक फ़िज़ा बने।


मंदिर जले तो रन्ज मुसलमान को भी हो।। 


पामाल होने पाये ना मस्जिद की आबरू। 


ये फ़िक्र मन्दिरों के निगेहबान को भी हो।।


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