जश्ने ईदे मीलादुन्नबी के ख़ास मौके पर हुज़ूर के घराने का तार्रुफ़

जश्ने ईदे मीलादुन्नबी के ख़ास मौके पर हुज़ूर के घराने का तार्रुफ़


 



 


अरब में जाहलियत के ज़माने में लोग अपनी लड़कियों को इस लिये जिंदा दफ़न कर देते थे कि वो किसी को दामाद बनाकर उस के आगे अपना सर नहीं झुकाना चाहते थे। इस लिए ज़ुल्मो तशद्दुद की सारी हदें पार कर जाते थे। समाज में बहुत सी बुराइयां रीति रिवाजों के रूप में फैली हुई थीं।


इन बुराइयों के ख़ात्मे के लिए अरब के तपते रेत में बानिये इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम) की पैदाइश 12 रबीउल अव्वल (22 अप्रैल सन 571 ई .) को शहरे मक्का में हुई । 610 ई. में आप को गारे हिरा में पहली वही (कुदरती ज्ञान) नाज़िल हुई। 25 साल की उम्र में आप का पहला निकाह हज़रत खदीजातुल कुबरा से हुआ। आप का विसाल (Death) 63 साल की उम्र में (नेट के अनुसार) 8 जून 632 ई (11 हिजरी ),फतावाये रिज़्वया के अनुसार 12 जून 636 ई. को बुखार, सरदर्द , शारीरिक व मानसिक थकान की वजह से हज़रत आयेशा सिद्दीका (रज़ि.) के घर पर मदीना मुनव्वरा में हुआ।


आप के वालिद का नाम हज़रत अब्दुल्ला (रज़ि,) , वालदा का नाम हज़रत आमना ( रज़ि) , आप के दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब , दादी हज़रत फ़ातिमा बिन्ते उमर , नाना हज़रत वहब बिन अब्देमुनाफ और नानी हज़रत बर्राह बिन्ते अब्दुल उज़ा । आप के चाचा, 1-हज़रत हमज़ा (रज़ि) , 2-हज़रत अब्बास (रज़ि) , 3- हारिस , 4-अबूतालिब ,5- ज़ुबैर , 6-अबुलहब , 7-ग़ईदाक , 8-मुक़व्विम , 9-ज़िरार , 10-कशम ,


11-अब्दुल काबा और 12- जाहल,थे। आपकी फूपियाँ कुल 6 थीं। 1-हज़रत सफ़िया (रज़ि) ,2- उम्मे हकीमुल बैज़ा , 3-अरवा , 4- आतिक़ा ,5- बुर्राह और 6- उमैमा आप की अज़वाज़े मुताहरात 11 हैं ।


1-हज़रत खदीजातुल कुबरा बिन्ते खूवैलीद(रज़ि) , 2-हज़रत सौदा बिन्ते ज़मआ , 3-हज़रत आयशा बिन्ते हज़रत अबूबकर सिद्दीक (रज़ि) , 4-हज़रत हफ़सा बिन्ते उमर फारूक (रज़ि) , 5-हज़रत ज़ैनब बिन्ते खुजैमा (रज़ि) , 6-हज़रत उम्मे सलमा बिन्ते उमय्या मखजूमी (रज़ि) , 7- हज़रत ज़ैनब बिन्ते हजश (रज़ि), 8- हज़रत जुवैरीया बिन्ते हारिस(रज़ि),9- हज़रत उम्में हबीबा बिन्ते अबूसुफ़यान (रज़ि),


10/हज़रत सफ़िया बिन्ते हई बिन अखतब (रज़ि) , 11-हज़रत मैमुना बिन्ते हारिस हिलालय (रज़ि) ।


आप के तीन बेटे पैदा हुए जो बचपन में ही इंतक़ाल फर्मा गये थे ।


1-हज़रत क़ासिम (रज़ि) , 2-हज़रत अब्दुल्ला (रज़ि) , 3-हज़रत इब्राहीम (रज़ि )। आप के दामाद तीन ये हैं ।


1-हज़रत अबुलआस बिन रबी (रज़ि) हज़रत ज़ैनब (रज़ि) के शौहर 2-हज़रत सय्यदना उस्मान बिन अफ्फान (रज़ि) , हज़रत रुक़य्या और हज़रत उम्मे कुलसूम (रज़ि) के शौहर , हज़रत 3-अली बिन आबि तालिब (रज़ि) हज़रत फ़ातिमा-तुज़ ज़हरा (रज़ि) के शौहर ।


आप के नवासे पांच हैं। 1-हज़रत अली बिन आबिल आस , 2-हज़रत अब्दुल्ला बिन उस्मान ग़नी (रज़ि) , 3-हज़रत हसन बिन अली (रज़ि) , 4-हज़रत हूसैन बिन अली (रज़ि) , 5-हज़रत मोहसिन बिन अली (रज़ि) ।आप की नवासियां चार हैं। 1- हज़रत उमामा बिन्ते अबिल आस, 2-हज़रत ज़ैनब बिन्ते अली (रज़ि) , 3-हज़रत उम्मे कुलसूम बिन्ते अली ( रज़ि ) , 4-हज़रत रुक़य्या बिन्ते अली (रज़ि)। 


( हवाला सैय्यदना मोहम्मद (सल्ल लाहो अलैहि व सल्लम ) अरबी नम्बर शाये करदा बरकाती पब्लिशर्स करांची व सीरते मुस्तफ़ा शाये करदा रूमी पब्लिकेशसन्स लाहौर ।


 


 " फ़लक को मेज़बानी की इजाज़त जब मिली होगी। 


   तो बेचारी ज़मीं की रात आँखों में कटी होगी ।।


   अरब के चाँद की आमद से पहले किसने सोचा था। 


   के तपते रेत की किस्मत में ऐसी चांदनी होगी "।।


 


आप ने पड़ोसियों के साथ हुस्ने सुलूक पर ख़ास ज़ोर दिया है। पड़ोसियों के साथ हुस्ने सुलूक का मुआमला मेहज़ एक तरग़इब का मुआमला नहीं , बल्कि ये तकमीले ईमान की लाज़मी शर्त और बंदे के सुवालेह व मुत्तक़ी होने की दलील भी है। सूराए " निसा" पारा नंबर पांच आयत( नंबर 111 से 114 ) में पड़ोसियों को तीन हिस्सों में तक़सीम किया गया है। 1- अल्जारे ज़िल क़ुर्बा ,2- वलजारिल जुनुब , 3- अलसाहेबुल जुनुब। आप ने फ़रमाया " वो मोमिन नहीं, जो खुद पेट भर कर खाये और उसके पहलू में उसका पड़ोसी भूखा रहे।" " तुम में कोई मोमिन ना होगा , जब तक अपने पड़ोसी की जान के लिए वही पियार ना रखे , जो खुद अपनी जान के लिए पियार रखता है।"   


                                                                                                                                    " सही मुस्लिम " 


एक जगह इरशाद फ़रमाया - अल्लाह की क़सम वो मोमिन नहीं हो सकता, अल्लाह की क़सम वो मोमिन नहीं हो सकता, अल्लाह की क़सम वो मोमिन नहीं हो सकता, सहाबा ने दरयाफ्त किया या रसूल अल्लाह कौन ? आप ने जवाब दिया , " जिसकी शरारतों से उसका हमसाया अमन में ना हो"।


               " सदियों के बाद भी जो मध्धम हुआ नहीँ।


                ऐसा कोई चराग़ तो अब तक जला नहीं।


                 पहला क़दम ज़मी पे तो दूजा है अर्श पर। 


                 उनकी बुलंदियों की कोई इंतेहा नहीं "।


 


मुहम्मद इरफ़ान (पूर्व प्रधानाचार्य)


जे.एल.एम.इंटर कालेज कुन्दरकी


       ( मुरादाबाद )


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