पुस्तके सच्ची मित्र व मार्गदर्शक - विनोद जिंदल

पुस्तके सच्ची मित्र व मार्गदर्शक - विनोद जिंदल 

मुरादनगर। पुस्तकें मनुष्य की सच्ची मित्र के साथ ही सबसे अच्छी मार्गदर्शक भी हैं। शिक्षाविद लीलावती रामगोपाल सरस्वती विद्या मंदिर के प्रबंधक विनोद जिंदल  ने एक विशेष भेंट वार्ता के दौरान पुस्तक दिवस के अवसर पर कहते हुए कहा कि आज के डिजिटल युग में भी पुस्तकों का महत्व कम नहीं हुआ है बल्कि और ज्यादा बढ़ गया है। क्योंकि अब पूरे विश्व की पुस्तकों को हम पढ़ सकते हैं। आदि काल में जब मानव ने भाषा को लिपि में रूप दिया तो अस्थायी होते अक्षरों को स्थायित्व देने के लिए पत्थर पर लिखा। पत्तों पर लिखा। बोल कर पीढ़ी दर पीढ़ी देने वाला ज्ञान इस प्रकार लिपि बद्ध हुआ। उन्होंने कहा कि जब कागज का आविष्कार हुआ तो वही ज्ञान कागज पर स्याही से अंकित होने लगा। वेद पुराण इतिहास, विज्ञान, उपन्यास, कविता, कहानी, नाटक मानसिक क्षमता भावनात्मक क्षमताओं की वृद्घि करती हैं। किताब अकेले पन की शांत वातावरण की संगिनी हैं। जितना समय पुस्तकों के साथ बताया जाए वह रात हो या दिन उतना ही ज्ञान प्राप्त है एक ही स्थान पर बैठे हुए संपूर्ण ब्रह्मांड का ज्ञान भी पुस्तकों में ही मिल जाता है या संसार से विरक्ती का मार्ग पाना हो तो पुस्तकों का सानिध्य महत्वपूर्ण मार्गदर्शक साबित होता है। पुस्तकालय मे विश्व ज्ञान समाहित होता है छात्र बस्ते में ज्ञान के बोझ को रख कंधे पर ढोता है।
किताबों की महत्ता इतनी है कि चाहे जान माल की हानि हो परंंतु अनमोल पुस्तकें बचनी ही चाहिए। ये गरीब और अमीर दोनों को अपने ज्ञानामृत से सरोबार करती हैं। किताब में बचपन मोर पंख रखता है कि सारा ज्ञान उसके अंदर समा जाए। परीक्षा से पूर्व रात्रि में उसे सिरहाने के नीचे इस उम्मीद से रख कर सोते हैं बच्चे कि सारा विषय उनके दिमाग में बैठ जाएगा और वे अच्छे अंक लेकर उत्तीर्ण हो जाएंगे।
ऐसी बातें भला डिजिटल में कहाँ।पुस्तकों को सम्मान के साथ सहेज कर रखिए ,उनका अध्ययन कीजिए और बौद्धिक क्षमताओं बढ़ाएं।

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